Q51
2 marksShort AnswerSection खंड ग

'यह दंतुरित मुस्कान' कविता में बाँस या बबूल की संज्ञा से किसे संबोधित किया गया है और क्यों?

यह दंतुरित मुस्कान — नागार्जुन (काव्यखंड, क्षितिज भाग-2)
यह दंतुरित मुस्कान — बांस/बबूल का प्रतीक
Official Answer

कवि नागार्जुन बाँस या बबूल की संज्ञा से स्वयं को (पिता को) संबोधित करते हैं, क्योंकि वे अपने संघर्षपूर्ण व नीरस जीवन के कारण स्वयं को रूखा और कठोर स्वभाव का मानते हैं। परंतु अपने शिशु की मासूम दंतुरित (दाँत निकलने के समय की टेढ़ी-मेढ़ी) मुस्कान देखकर उनका यह कठोर व रूखा हृदय भी कोमल और सरस हो उठता है, ठीक जैसे मरुस्थल में कमल खिल उठे।

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Marking Scheme

  • 11 अंक: सही पहचान कि बाँस/बबूल की संज्ञा कवि स्वयं (पिता) को दी गई है, शिशु को नहीं।
  • 21 अंक: कारण स्पष्ट करना — कवि का रूखा/कठोर स्वभाव, जो शिशु की मुस्कान से कोमल हो जाता है।

Hint

ध्यान दें — बाँस/बबूल की उपमा शिशु को नहीं बल्कि स्वयं कवि (पिता) को दी गई है, उसके रूखे स्वभाव के लिए।

Quick Oral Answer

बाँस/बबूल की संज्ञा कवि स्वयं को दी गई है क्योंकि वे स्वयं को रूखा-कठोर मानते हैं, परंतु शिशु की मुस्कान से उनका हृदय कोमल हो जाता है।

Analysis & Explanation

यह प्रश्न नागार्जुन रचित कविता 'यह दंतुरित मुस्कान' (क्षितिज भाग 2) पर आधारित है।


प्रसंग

  • कवि अपने नन्हे शिशु की मासूम मुस्कान पर यह भावपूर्ण रचना लिखते हैं।

परीक्षा में सावधानी

  • विद्यार्थी अक्सर भ्रमित होकर बाँस/बबूल की संज्ञा शिशु को दे देते हैं, जबकि यह संबोधन कवि स्वयं अपने लिए करता है — यह सबसे सामान्य गलती है।
  • स्पष्ट करें कि कवि जीवन-संघर्ष व गरीबी के कारण स्वयं को रूखा (बबूल-सा) मानता है, परंतु शिशु की निश्छल मुस्कान उस रूखेपन को कोमल बना देती है।

वास्तविक जीवन

  • यह वात्सल्य रस की सुंदर अभिव्यक्ति है और दर्शाती है कि बच्चों की निर्दोष खुशी कठोर से कठोर हृदय को भी बदल सकती है — जो अभिभावकों के अनुभव से मेल खाता है।

Common Mistakes

  1. 1बाँस/बबूल की संज्ञा को गलती से शिशु के लिए मान लेना, जबकि यह कवि स्वयं के लिए है।
  2. 2कारण स्पष्ट किए बिना केवल तथ्य बता देना।

Interesting Facts

नागार्जुन (वैद्यनाथ मिश्र) हिंदी के प्रगतिशील कवि माने जाते हैं और यह कविता वात्सल्य रस की एक दुर्लभ रचना है क्योंकि उन्हें मुख्यतः जनवादी व सामाजिक कवि के रूप में जाना जाता है।

कविता में शिशु की मुस्कान की तुलना 'मृतक में भी जान डाल देने वाली' शक्ति से की गई है, जो इसकी भावनात्मक गहराई को दर्शाती है।

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Frequently Asked Questions

'यह दंतुरित मुस्कान' कविता का मूल भाव क्या है?

इस कविता का मूल भाव वात्सल्य है — शिशु की निश्छल मुस्कान कठोर से कठोर हृदय को भी कोमल बना देती है।

कवि ने अपने लिए बाँस/बबूल की उपमा क्यों दी?

क्योंकि कवि जीवन के संघर्ष और गरीबी के कारण स्वयं को रूखा व कठोर मानते हैं।