Question 43Short AnswerSection खंड ग

ऊधो! तुम हौ अति बड़भागी।

अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।

पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।

ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी।

प्रीति-नदी मैं पाउँ न बोरयौ, दृष्टि न रूप परागी।

'सूरदास' अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।।

यह दंतुरित मुस्कान — नागार्जुन (काव्यखंड, क्षितिज भाग-2)
सूरदास के पद — भ्रमरगीत

Official answer

यह पद सूरदास के 'भ्रमरगीत सार' से लिया गया है। गोपियाँ उद्धव को व्यंग्य में 'बड़भागी' कहती हैं क्योंकि श्रीकृष्ण के निकट रहकर भी उद्धव का मन प्रेम-बंधन से पूर्णतः निर्लिप्त रहा — ठीक जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी गीला नहीं होता, और जल में डूबी तेल-भरी घड़े पर बूँद नहीं ठहरती। उद्धव ने प्रेम-नदी में पाँव नहीं डुबोए, न ही कृष्ण-सौंदर्य से उनकी दृष्टि रँगी गई। इसके विपरीत, भोली गोपियाँ कृष्ण-प्रेम में उसी तरह रच-बस गई हैं जैसे चींटियाँ गुड़ में चिपक जाती हैं — वे प्रेम में पूर्णतः आसक्त हो चुकी हैं।

Answer keywords:सूरदासभ्रमरगीतउद्धवगोपीकृष्ण-प्रेमयोग-संदेशकमल पत्रगुड़-चींटी

Marking scheme

  1. 1.यह पद्यांश आगे आने वाले उपप्रश्नों (क्रमांक 44-48) हेतु आधार-सामग्री है; इसका स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन नहीं किया जाता।
  2. 2.विद्यार्थी को पद पढ़कर भाव, प्रसंग व वक्ता-श्रोता की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए।

Hint

यह पद भ्रमरगीत खंड से है; ध्यान दें कि कमल-पत्र, तेल-घट व नदी की उपमाएँ उद्धव के निर्लिप्त स्वभाव के लिए हैं जबकि 'गुड़-चींटी' गोपियों की गहन आसक्ति के लिए है।

Quick oral answer

यह सूरदास के भ्रमरगीत का पद है जिसमें गोपियाँ योग का संदेश लेकर आए उद्धव पर व्यंग्य करते हुए अपनी अनन्य कृष्ण-भक्ति दर्शाती हैं।

Common mistakes

  1. 1.कमल-पत्र, तेल-घट, प्रीति-नदी की उपमाओं को गोपियों या कृष्ण से जोड़ देना, जबकि ये उद्धव के निर्लिप्त स्वभाव के लिए हैं।
  2. 2.'बड़भागी' शब्द को सीधे शाब्दिक अर्थ में लेना और व्यंग्य/वक्रोक्ति को न पहचानना।
  3. 3.गोपियों की भावुकता को कमजोरी समझना, जबकि वास्तव में यह अनन्य भक्ति-भाव का प्रतीक है।

Analysis and explanation

यह पद्यांश सूरदास-रचित 'भ्रमरगीत सार' से लिया गया है और आगे आने वाले पाँच उपप्रश्नों (44-48) का आधार-सामग्री है।


प्रसंग

  • श्रीकृष्ण मथुरा जाने के बाद योगी उद्धव को निर्गुण-योग का संदेश देकर गोपियों के पास भेजते हैं; गोपियाँ इस संदेश को अस्वीकार कर उद्धव का व्यंग्यपूर्ण उपहास करती हैं।

मुख्य बिंदु (उपमाएँ व उनका अर्थ)

  • 'बड़भागी' — वक्रोक्ति; वास्तव में गोपियाँ उद्धव को 'भाग्यहीन' सिद्ध कर रही हैं क्योंकि प्रेम से वंचित रहना उनकी दृष्टि में दुर्भाग्य है।
  • कमल-पत्र और जल में डूबी तेल-घट — दोनों उद्धव के निर्लिप्त, योगी-स्वभाव के प्रतीक हैं।
  • 'गुड़-चींटी' दृष्टांत — गोपियों की सघन, अटूट कृष्ण-भक्ति को दर्शाता है।

परीक्षा में सावधानी

  • कमल-पत्र, तेल-घट व प्रीति-नदी की उपमाएँ 'उद्धव' के लिए प्रयुक्त हैं, न कि कृष्ण या गोपियों के लिए — विद्यार्थी प्रायः इसमें भ्रमित होते हैं।

वास्तविक जीवन/काव्य-सौंदर्य

  • सहज लोक-बिंबों द्वारा गूढ़ भाव व्यक्त करना सूरदास की शैली की विशेषता है और यह पद भक्ति-काल में 'ज्ञान पर प्रेम की श्रेष्ठता' स्थापित करता है।

Interesting facts

सूरदास (1478-1583 अनुमानित) कृष्ण-भक्ति काव्यधारा के शिखर कवि माने जाते हैं; उनकी रचना 'सूरसागर' में लगभग सवा लाख पद संकलित हैं।

'भ्रमरगीत' सूरसागर का वह भाग है जिसमें गोपियों और उद्धव के मध्य ज्ञान-योग बनाम प्रेम-भक्ति पर संवाद है; इसे हिंदी साहित्य में वाद-विवाद शैली का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सूरदास को 'वात्सल्य और श्रृंगार रस का सम्राट' कहा है।

Question details

Q43 of 64 questions

Board
CBSE
Class
Class 10
Subject
Hindi Course A
Year
2026
Section
Section खंड ग
Marks
0
Type
Short Answer
Chapter
यह दंतुरित मुस्कान — नागार्जुन (काव्यखंड, क्षितिज भाग-2)
Topic
सूरदास के पद — भ्रमरगीत
Bloom's level
understand
Syllabus topic
काव्य खंड: 'पद' (सूरदास) — भ्रमरगीत सार, गोपियों का उद्धव के प्रति व्यंग्य
Author
CBSE
Reviewed by
Padhantu Academic Team

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Frequently asked questions

यह पद किस कवि की रचना है और किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह पद सूरदास द्वारा रचित है और उनके प्रसिद्ध ग्रंथ 'सूरसागर' के 'भ्रमरगीत सार' खंड से लिया गया है।

गोपियाँ उद्धव को 'बड़भागी' क्यों कहती हैं जबकि यह व्यंग्य है?

क्योंकि गोपियों की दृष्टि में प्रेम से वंचित, निर्लिप्त रहना दुर्भाग्य है; अतः उद्धव को 'बड़भागी' कहना वास्तव में उन्हें 'भाग्यहीन' सिद्ध करने वाला व्यंग्य है।