Q41
2 marksShort AnswerSection खंड ग

किस आधार पर यह कहा जा सकता है कि 'लखनवी अंदाज़' पाठ में नवाब साहब खीरे के साथ देखे जाने पर ही असहज हो गए थे?

अपठित बोध (काव्यांश)
नवाब साहब की नकली शान और खीरे का प्रसंग
Official Answer

नवाब साहब पुरानी नवाबी शान-शौकत में डूबे व्यक्ति थे, जो अपनी तहज़ीब व रुतबे को लेकर अत्यंत सचेत रहते थे। खीरा गरीबों/आम लोगों का भोजन माना जाता था, इसलिए अजनबी (लेखक) के सामने खीरा खाते देखे जाने पर उन्हें अपनी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचने का डर हुआ। इसीलिए उन्होंने खीरे को काटकर, सूंघकर, रस चखकर ही खिड़की से बाहर फेंक दिया और डकार लेकर तृप्ति का दिखावा किया, ताकि नवाबी गरिमा बनी रहे। यह पूरा दिखावा स्पष्ट करता है कि वे खीरे के साथ देखे जाने मात्र से असहज महसूस कर रहे थे।

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Marking Scheme

  • 11 अंक: यह स्पष्ट करना कि नवाब साहब अपनी नवाबी शान-शौकत और प्रतिष्ठा को लेकर अत्यंत सचेत थे और खीरे को निम्न स्तर का भोजन मानते थे।
  • 21 अंक: घटना का उल्लेख - खीरा काटकर, सूंघकर, रस चखकर फेंक देना और डकार लेकर तृप्ति का दिखावा करना - आधार के रूप में देना।

Hint

नवाब साहब की नवाबी शान और खीरे को 'सामान्य/गरीब' भोजन मानने की मानसिकता को जोड़कर उत्तर लिखें।

Quick Oral Answer

नवाब साहब ने खीरे को सूंघकर और रस चखकर ही फेंक दिया तथा डकार लेकर तृप्ति जताई - यह दिखाता है कि वे लेखक के सामने खीरा खाते हुए देखे जाने से अपनी नवाबी शान को कम होता महसूस कर रहे थे, इसलिए असहज हो गए।

Analysis & Explanation

यशपाल का 'लखनवी अंदाज़' सामंती वर्ग के खोखले आडंबर और झूठी शान-शौकत पर व्यंग्य है।


अवधारणा

  • नवाब साहब अकेले भूख से व्याकुल होकर खीरा खरीदते हैं, पर सतर्क रहते हैं कि कोई उन्हें खाते हुए न देखे।
  • लेखक के अचानक डिब्बे में आने पर वे असहजता छिपाने के लिए अभिनय करने लगते हैं।

घटना (आधार)

  • खीरे को काटना, नमक-मिर्च लगाना, सूंघना - पर खाना नहीं, बल्कि खिड़की से बाहर फेंक देना और डकार लेकर तृप्ति दिखाना।

परीक्षा में सावधानी

  • केवल 'खीरा फेंकना' घटना बता देना पर्याप्त नहीं; इसके पीछे की सामंती मानसिकता और दिखावटी तहज़ीब स्पष्ट करना आवश्यक है, तभी पूर्ण अंक मिलेंगे।

Common Mistakes

  1. 1केवल यह लिखना कि 'नवाब साहब को खीरा पसंद नहीं था', जबकि वास्तविक कारण सामाजिक प्रतिष्ठा और दिखावे से जुड़ा है।
  2. 2घटना का वर्णन करते समय यह न बताना कि नवाब साहब ने खीरा वास्तव में खाया नहीं, केवल दिखावा किया।

Interesting Facts

यशपाल ने इस कहानी के माध्यम से आज़ादी के बाद भी बचे सामंती वर्ग की खोखली शान-शौकत और पाखंड को उजागर किया है।

'लखनवी अंदाज़' शीर्षक स्वयं व्यंग्यात्मक है - यह लखनऊ की तहज़ीब की आड़ में पाखंड और दिखावे को इंगित करता है।

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Frequently Asked Questions

नवाब साहब ने खीरे का क्या किया?

उन्होंने खीरे को काटकर, नमक-मिर्च लगाकर सूंघा और रस चखा, परंतु खाया नहीं, खिड़की से बाहर फेंक दिया।

पाठ का मुख्य व्यंग्य किस पर है?

सामंती वर्ग की खोखली शान-शौकत, दिखावटी तहज़ीब और आडंबर पर।