Q7
Short AnswerSection

निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए :


मन कल्पनाशील है, इसलिए सुंदर सतरंगी कल्पनाएँ बनाकर लुभाता है, मगर सच का अनुभव करना हो तो कल्पना के आसमान से उतरकर सच के धरातल पर आना पड़ता है। काँटे, यानी जो भी दुखद है, जो भी नकारात्मक है, उसका स्वीकार। लेकिन उन्हें तो हम अपने भीतर कहीं गहरे दबा देते हैं, उनसे बचना चाहते हैं। जीवन को अच्छे और बुरे में बाँटकर हमने खुद के साथ बड़ा अन्याय किया है। जिन्दगी आदमी की सतरंगी कल्पनाओं के सहारे नहीं चलती, उसके अपने नियम हैं, जो बिल्कुल वैज्ञानिक हैं। हमारा पूरा अस्तित्व बना तरंगों से; यह ऊर्जा का महासागर है और ऊर्जाएँ स्वभावतः एक दूसरे के विपरीत और परिपूरक होती हैं। जो विपरीत दिखाई देता है, वह दूसरे को सहारा देता है। दो विपरीत एक दूसरे को सँभालते हैं।


अगर आप चाहते हैं कि सच में आपके जीवन का फूल खिले, तो काँटों से दूर रहने की आदत छोड़ दें। ज्योति अंधेरे में ही जगमगाती है। पत्थर पर जब छेनी चलती है, तभी तो मूर्तियाँ निर्मित होती हैं। अगर पत्थर कह दे कि नहीं, छेनी मुझे बर्दाश्त नहीं, मुझे काटो मत। मैं जैसा हूँ, मुझे वैसा ही रहने दो; तो अनगढ़ ही रह जाएगा। छेनी की चोट सहना उसके लिए जरूरी है। लोग काँटों से इसलिए बचते हैं कि उनके छिदने पर जो दुख होता है, उसकी पीड़ा सहने की उनमें शक्ति नहीं है। काँटों से निबाह करना काफी नहीं है, काँटों से उतना ही प्रेम करना होगा, जितना फूलों से। अगर आपने काँटों से प्रेम न किया, तो आप प्लास्टिक के फूल ही खरीद लाएँगे, क्योंकि उनमें काँटे नहीं होते।


जिंदगी के दोहरे रूप को भली-भाँति पहचानिए। अगर आपने जिद की कि हम तो एक को ही पकड़कर जिएँगे, तो आपको यह भी मानना होगा कि आप एक ही पैर से, एक ही पतवार से अपनी नाव खे लेंगे। जब आप एक ही पतवार से नाव को खेओगे तो वह गोल-गोल चक्कर लगाने लगेगी। ऐसी ही जिंदगी है। दोनों पतवारों से खेकर ही इसे किनारे पहुँचाया जा सकता है।

अपठित गद्यांश (पाठ्येतर/Unseen Passage – खंड क)
अपठित गद्यांश – काँटे और फूल: जीवन के विरोधाभासों का सामंजस्य
Official Answer

यह गद्यांश स्वयं कोई प्रश्न नहीं, बल्कि आगे के प्रश्नों 2(i)-2(v) का आधार है; अतः इसके पृथक अंक नहीं हैं। केंद्रीय भाव: जीवन केवल सुखद कल्पनाओं (फूल) से नहीं चलता; दुख-कष्ट (काँटे) भी उतने ही आवश्यक हैं। जैसे छेनी की चोट सहे बिना मूर्ति नहीं बनती और अंधेरे बिना प्रकाश का मोल नहीं समझा जाता, वैसे ही सुख-दुख परस्पर पूरक हैं — जीवन-नाव दोनों पतवारों (सुख व दुख) से ही किनारे पहुँचती है।

काँटे और फूलविरोधाभासों का सामंजस्यसुख-दुखपतवारछेनी और मूर्तिअपठित गद्यांशसंतुलित जीवन

Marking Scheme

  • 1यह प्रविष्टि केवल मूल गद्यांश है; इसके स्वयं कोई पृथक अंक निर्धारित नहीं हैं (0 अंक)।
  • 2गद्यांश पर आधारित सभी अंक नीचे दिए गए उपप्रश्नों 2(i) से 2(v) (प्रश्न संख्या 8-12) में विभाजित हैं।
  • 3मूल्यांकन हेतु आवश्यक है कि परीक्षार्थी गद्यांश को पूर्ण रूप से समझकर ही आगे के प्रश्नों के उत्तर लिखे।

Hint

गद्यांश को ध्यान से पढ़ते समय फूल-काँटे, अंधेरा-उजाला और पत्थर-छेनी-मूर्ति के प्रतीकों को रेखांकित करें; ये सभी उपप्रश्नों (2(i)-2(v)) के उत्तर की कुंजी हैं।

Quick Oral Answer

यह गद्यांश बताता है कि जीवन में सुख और दुख दोनों आवश्यक और पूरक हैं; जैसे पत्थर पर छेनी चलने से ही मूर्ति बनती है, वैसे ही कष्ट सहे बिना जीवन नहीं निखरता।

Analysis & Explanation

यह अपठित गद्यांश खंड क में दिया गया आधार-अंश है, जिस पर आगे पाँच उपप्रश्न (प्रश्न संख्या 8 से 12) पूछे गए हैं।


अंक-व्यवस्था

  • इस मूल प्रविष्टि के स्वतंत्र अंक शून्य (0) हैं
  • सभी अंक नीचे के उपप्रश्नों 2(i)-2(v) में विभाजित हैं

गद्यांश का मूल विषय

  • जीवन में विपरीत तत्वों (सुख-दुख, प्रकाश-अंधकार, फूल-काँटे) का सामंजस्य
  • मनुष्य जीवन को अच्छे-बुरे खानों में बाँटकर दुखद अनुभवों को दबाना/टालना चाहता है, जो एक भूल है

प्रमुख प्रतीक

  • फूल-काँटे → सुख-दुख का सह-अस्तित्व
  • अंधेरा-उजाला → कष्ट के बिना सुख का मोल नहीं
  • पत्थर-छेनी-मूर्ति → कष्ट सहे बिना जीवन नहीं निखरता
  • नाव-दो पतवार → संतुलित जीवन के लिए सुख-दुख दोनों आवश्यक

परीक्षा में सावधानी

  • गद्यांश को सरसरी तौर पर न पढ़ें; दो बार पढ़कर प्रतीकों (छेनी=कष्ट, पत्थर=जीवन, मूर्ति=निखरा व्यक्तित्व) का सही अर्थ समझें, तभी आगे के प्रश्नों में सटीक उत्तर संभव है।

Common Mistakes

  1. 1गद्यांश को सरसरी तौर पर पढ़कर सीधे प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयास करना, जिससे प्रतीकों का गलत अर्थ निकलता है।
  2. 2फूल-काँटे और सुख-दुख के रूपक को शाब्दिक अर्थ में लेना, न कि जीवन-दर्शन के रूप में समझना।
  3. 3गद्यांश के अंत में दिए गए 'नाव और दो पतवार' के निष्कर्ष को नज़रअंदाज़ कर देना, जो संपूर्ण गद्यांश का सार है।

Interesting Facts

अपठित गद्यांश खंड में प्रायः जीवन-दर्शन, प्रेरणा अथवा सामाजिक चेतना से जुड़े विषय दिए जाते हैं ताकि विद्यार्थी की पठन-बोध क्षमता के साथ-साथ चिंतन-क्षमता का भी मूल्यांकन हो सके।

CBSE की मार्किंग नीति के अनुसार अपठित गद्यांश के उपप्रश्नों के उत्तर गद्यांश में दी गई भाषा और भाव के आधार पर ही स्वीकार किए जाते हैं, बाहरी ज्ञान के आधार पर नहीं।

'दो विपरीत एक-दूसरे को सँभालते हैं' जैसी पंक्तियाँ ऊर्जा/तरंग सिद्धांत (यिन-यांग जैसी अवधारणा) से प्रेरित प्रतीत होती हैं, जो भारतीय व पूर्वी चिंतन परंपरा में समानांतर रूप से मिलती हैं।

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Frequently Asked Questions

इस गद्यांश-प्रविष्टि के अंक शून्य क्यों हैं?

क्योंकि यह केवल मूल गद्यांश है; इस पर आधारित सभी अंक नीचे के पाँच उपप्रश्नों (2(i) से 2(v), प्रश्न संख्या 8-12) में बँटे हुए हैं।

गद्यांश का मुख्य संदेश क्या है?

जीवन में सुख-दुख, प्रकाश-अंधकार जैसे विपरीत तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों को स्वीकार किए बिना संतुलित व सार्थक जीवन जीना संभव नहीं है।

गद्यांश में प्रयुक्त प्रमुख प्रतीक कौन-कौन से हैं?

फूल और काँटे, अंधेरा और उजाला, पत्थर-छेनी-मूर्ति, तथा नाव के दो पतवार — ये सभी प्रतीक जीवन के दोहरे स्वरूप को दर्शाते हैं।