किसी दिन एक शिष्या ने डरते-डरते खाँ साहब को टोका, ''बाबा ! आप यह क्या करते हैं, इतनी प्रतिष्ठा है आपकी। अब तो आपको भारतरत्न भी मिल चुका है, यह फटी तहमद न पहना करें। अच्छा नहीं लगता, जब भी कोई आता है आप इसी फटी तहमद में सबसे मिलते हैं।'' खाँ साहब मुस्कराए। लाड़ से भरकर बोले, ''धत्! पगली ई भारतरत्न हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं। तुम लोगों की तरह बनाव सिंगार देखते रहते, तो उमर ही बीत जाती, हो चुकती शहनाई। तब क्या खाक रियाज़ हो पाता। ठीक है बिटिया, आगे से नहीं पहनेंगे, मगर इतना बताई देते हैं कि मालिक से यही दुआ है फटा सुर न बख्शों। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।''
किसी दिन एक शिष्या ने डरते-डरते खाँ साहब को टोका, ''बाबा ! आप यह क्या करते हैं, इतनी प्रतिष्ठा है आपकी। अब तो आपको भारतरत्न भी मिल चुका है, यह फटी तहमद न पहना करें। अच्छा नहीं लगता, जब भी कोई आता है आप इसी फटी तहमद में सबसे मिलते हैं।'' खाँ साहब मुस्कराए। लाड़ से भरकर बोले, ''धत्! पगली ई भारतरत्न हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं। तुम लोगों की तरह बनाव सिंगार देखते रहते, तो उमर ही बीत जाती, हो चुकती शहनाई। तब क्या खाक रियाज़ हो पाता। ठीक है बिटिया, आगे से नहीं पहनेंगे, मगर इतना बताई देते हैं कि मालिक से यही दुआ है फटा सुर न बख्शों। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।''
यह गद्यांश 'प्रश्न 7' के अंतर्गत दिया गया अपठित उद्दीपक अंश है, जिस पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न 34, 35 व 36 पूछे गए हैं — इसका स्वतंत्र अंक-आवंटन नहीं है, अंक उप-प्रश्नों 7(i)-7(iii) में निहित हैं। गद्यांश का केंद्रीय भाव: भारतरत्न जैसे सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित होने पर भी उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ अपनी सरलता, विनम्रता व साधना के प्रति समर्पण नहीं छोड़ते; उनके लिए बाहरी बनाव-श्रृंगार से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है 'सच्चे सुर' की साधना, जो वे ईश्वर से माँगते हैं, न कि भौतिक प्रतिष्ठा या दिखावा।
Marking Scheme
- 1इस गद्यांश-अंश का स्वतंत्र अंक-आवंटन नहीं है; अंक उप-प्रश्नों 7(i), 7(ii), 7(iii) (क्रमांक 34, 35, 36) में निर्धारित हैं — प्रत्येक सही उत्तर पर 1 अंक।
Hint
यह अंश स्वयं में प्रश्न नहीं बल्कि आगे आने वाले तीन बहुविकल्पीय प्रश्नों (34, 35, 36) का आधार-पाठ (गद्यांश) है — ध्यान से पढ़कर भाव समझें।
Quick Oral Answer
यह अपठित गद्यांश उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की सरलता और साधना-निष्ठा को दर्शाता है — भारतरत्न मिलने पर भी वे बाहरी दिखावे को महत्त्व नहीं देते और सच्चे सुर की साधना को ही सर्वोपरि मानते हैं।
Analysis & Explanation
यह अपठित गद्यांश उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के जीवन-चरित्र पर आधारित है और प्रश्न 34-36 (7(i)-7(iii)) का आधार-अंश है, स्वयं इसका कोई पृथक अंक-आवंटन नहीं है।
मुख्य भाव
- शिष्या की चिंता खाँ साहब की बाहरी छवि/प्रतिष्ठा को लेकर है, जबकि खाँ साहब के लिए भारतरत्न सम्मान उनकी कला (शहनाई) को मिला है, न कि पहनावे को।
- संदेश यह है कि सच्ची साधना और सफलता विनम्रता व निरंतर अभ्यास से मिलती है, बाहरी आडंबर से नहीं।
परीक्षा में सावधानी
- गद्यांश-आधारित प्रश्नों के उत्तर सदा मूल पाठ के शब्दों/भावों की सीमा के भीतर ही खोजने चाहिए, बाहरी अनुमान न लगाएँ।
वास्तविक जीवन
- बड़ी उपलब्धि पाकर भी सरलता व विनम्रता बनाए रखना सच्ची महानता की पहचान है।
Common Mistakes
- 1गद्यांश को पढ़े बिना सीधे उप-प्रश्नों (MCQ) के उत्तर देने का प्रयास करना।
- 2गद्यांश में न कहे गए तथ्यों के आधार पर अनुमानित उत्तर देना।
- 3पात्रों (शिष्या और खाँ साहब) के भावों को आपस में मिला देना।
Interesting Facts
उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ को वर्ष 2001 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारतरत्न' से सम्मानित किया गया था — यह सम्मान पाने वाले वे तीसरे शास्त्रीय संगीतज्ञ थे।
बिस्मिल्ला खाँ ने अपने जीवन-भर बनारस को नहीं छोड़ा और साधगीपूर्ण जीवन-शैली अपनाई, भले ही उन्हें विदेशों से भी अनेक प्रस्ताव मिले।
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Frequently Asked Questions
इस गद्यांश पर कितने प्रश्न आधारित हैं?
इस गद्यांश पर तीन बहुविकल्पीय प्रश्न (7(i), 7(ii), 7(iii) — प्रश्न क्रमांक 34, 35, 36) आधारित हैं।
गद्यांश का केंद्रीय संदेश क्या है?
सच्चा सम्मान बाहरी दिखावे से नहीं बल्कि विनम्रता, सरलता और निरंतर साधना से मिलता है।