'परचूनिये, आढ़तीये भी अपने बच्चों को स्कूल भेजना ज़रूरी न समझते।' - 'सपनों के से दिन' पाठ से उद्धृत प्रस्तुत पंक्ति के संदर्भ में लिखिए कि तत्कालीन समय में शिक्षा के प्रति लोगों का क्या दृष्टिकोण था और इसका क्या कारण हो सकता है ?
'परचूनिये, आढ़तीये भी अपने बच्चों को स्कूल भेजना ज़रूरी न समझते।' - 'सपनों के से दिन' पाठ से उद्धृत प्रस्तुत पंक्ति के संदर्भ में लिखिए कि तत्कालीन समय में शिक्षा के प्रति लोगों का क्या दृष्टिकोण था और इसका क्या कारण हो सकता है ?
Official answer
'सपनों के से दिन' पाठ के अनुसार तत्कालीन समाज में शिक्षा के प्रति लोगों का दृष्टिकोण उदासीन और उपेक्षापूर्ण था। परचूनिये और आढ़तीये जैसे व्यापारी वर्ग के लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजना ज़रूरी नहीं मानते थे। इसके दो प्रमुख कारण थे —
- वे समझते थे कि लेन-देन व दुकानदारी का व्यावहारिक ज्ञान बच्चे दुकान पर बैठकर स्वयं सीख लेंगे, इसके लिए स्कूली शिक्षा आवश्यक नहीं है।
- बच्चों को छोटी उम्र से ही काम पर लगाकर आर्थिक बचत की जाती थी, क्योंकि उन्हें तो आगे चलकर पुश्तैनी व्यवसाय ही सँभालना था।
इस प्रकार गरीबी, तात्कालिक आर्थिक ज़रूरत और शिक्षा के दीर्घकालिक महत्त्व की जागरूकता की कमी ने यह उपेक्षापूर्ण रवैया उत्पन्न किया।
Marking scheme
- 1.1 अंक: तत्कालीन दृष्टिकोण का सही वर्णन — शिक्षा के प्रति उदासीनता/उपेक्षा।
- 2.1 अंक: कम-से-कम दो ठोस कारणों का उल्लेख (व्यावहारिक अनुभव पर्याप्त मानना, आर्थिक बचत/बाल श्रम, पुश्तैनी व्यवसाय की निरंतरता)।
- 3.1 अंक: भाषा की स्पष्टता, प्रवाह और पाठ के संदर्भ से सही जुड़ाव।
Hint
पहले दृष्टिकोण (उदासीनता/उपेक्षा) बताएँ, फिर कम-से-कम दो-तीन ठोस कारण (व्यावहारिक ज्ञान पर्याप्त मानना, आर्थिक बचत, पुश्तैनी व्यवसाय) दें।
Quick oral answer
तत्कालीन समाज में व्यापारी वर्ग यह मानता था कि व्यापार सीखने के लिए स्कूली शिक्षा नहीं, बल्कि दुकान पर व्यावहारिक अनुभव पर्याप्त है, इसलिए वे अपने बच्चों को स्कूल भेजना ज़रूरी नहीं समझते थे।
Common mistakes
- 1.केवल दृष्टिकोण बताना, कारण न देना — जबकि प्रश्न में स्पष्ट रूप से कारण भी पूछा गया है।
- 2.उत्तर को सामान्यीकृत कर देना जैसे 'लोग अनपढ़ थे' बिना यह बताए कि व्यापारी वर्ग विशेष रूप से स्कूली शिक्षा को अनावश्यक क्यों मानता था।
- 3.पाठ के प्रसंग से जोड़े बिना काल्पनिक/व्यक्तिगत विचार लिख देना।
Analysis and explanation
यह प्रश्न 'सपनों के से दिन' पाठ के सामाजिक-आर्थिक संदर्भ की समझ जाँचता है।
संदर्भ / अवधारणा
- लेखक गुरदयाल सिंह ने अपने बचपन के अनुभवों के आधार पर तत्कालीन पंजाब के छोटे कस्बों/गाँवों के समाज का चित्रण किया है, जहाँ शिक्षा को जीवन में उन्नति का साधन नहीं बल्कि एक वैकल्पिक और गौण गतिविधि माना जाता था।
- व्यापारी वर्ग (परचूनिये, आढ़तीये) व्यावहारिक ज्ञान को औपचारिक शिक्षा से अधिक महत्त्व देते थे क्योंकि उनकी आजीविका सीधे व्यापार-कौशल पर निर्भर थी, न कि डिग्री या साक्षरता पर।
परीक्षा में सावधानी
- केवल यह न लिखें कि 'लोग शिक्षा को महत्त्व नहीं देते थे' — ठोस कारण (आर्थिक बचत, पुश्तैनी व्यवसाय की निरंतरता, जागरूकता की कमी) स्पष्ट करना ज़रूरी है।
- 3 अंकों के प्रश्न में कारण सहित विश्लेषण अपेक्षित है।
वास्तविक जीवन में प्रासंगिकता
- आज भी कई पिछड़े क्षेत्रों में बाल श्रम और शिक्षा की उपेक्षा के पीछे यही आर्थिक कारण काम करते हैं, इसलिए यह पाठ शिक्षा के सार्वभौमीकरण के महत्त्व को रेखांकित करता है।
Interesting facts
लेखक गुरदयाल सिंह पंजाबी के प्रसिद्ध कथाकार थे, जिन्हें उनके साहित्यिक योगदान के लिए 1975 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और 1999 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
'सपनों के से दिन' मूलतः लेखक के आत्मकथात्मक संस्मरण का अंश है, जो पंजाब के देहाती परिवेश और तत्कालीन शिक्षा-व्यवस्था की सीमाओं को उजागर करता है।
Question details
Q55 of 66 questions
- Board
- CBSE
- Class
- Class 10
- Subject
- Hindi Course B
- Year
- 2026
- Section
- Section ग
- Marks
- 3
- Type
- Short Answer
- Chapter
- अपठित गद्यांश (गद्य बोध)
- Topic
- सपनों के से दिन — शिक्षा के प्रति तत्कालीन दृष्टिकोण
- Bloom's level
- understand
- Syllabus topic
- स्पर्श भाग-2, गद्य खंड: 'सपनों के से दिन' — तत्कालीन समाज में शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण और उसके कारण
- Author
- CBSE
- Reviewed by
- Padhantu Academic Team
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Frequently asked questions
'परचूनिये' और 'आढ़तीये' शब्दों का क्या अर्थ है?
'परचूनिये' का अर्थ है छोटी-मोटी वस्तुएँ बेचने वाला खुदरा दुकानदार (grocer) और 'आढ़तीये' का अर्थ है कमीशन पर व्यापार करने वाला थोक व्यापारी/कमीशन एजेंट।
पाठ 'सपनों के से दिन' के लेखक कौन हैं?
इस पाठ के लेखक गुरदयाल सिंह हैं, जिन्होंने अपने बचपन के अनुभवों के आधार पर तत्कालीन समाज और स्कूली जीवन का चित्रण किया है।
इस पंक्ति से लेखक क्या संदेश देना चाहते हैं?
लेखक यह दिखाना चाहते हैं कि तत्कालीन समाज में शिक्षा को जीवन-निर्माण का साधन नहीं बल्कि एक गौण गतिविधि माना जाता था, विशेषकर व्यापारी वर्ग में, जिसके पीछे आर्थिक व सामाजिक कारण थे।