Question 492 marksShort AnswerSection ग

सुख-दुख के विषय में कबीर और सांसारिक मनुष्यों के दृष्टिकोण में क्या अंतर है ? 'साखी' कविता के आधार पर लिखिए।

अपठित गद्यांश (गद्य बोध)
साखी — सुख-दुख पर कबीर की दृष्टि

Official answer

सांसारिक मनुष्य: केवल दुख आने पर ही ईश्वर का सुमिरन करते हैं; सुख के समय भगवान को भूलकर भोग-विलास में डूबे रहते हैं।

कबीर का दृष्टिकोण: यदि मनुष्य सुख में भी परमात्मा को स्मरण रखे और कृतज्ञ बना रहे, तो दुख आता ही नहीं — सच्चा भक्त सुख-दुख दोनों में समभाव रखते हुए निरंतर सुमिरन करता है, जबकि सांसारिक मनुष्य स्वार्थवश केवल संकट में ही भक्ति की ओर मुड़ता है।

Answer keywords:साखीकबीरसुमिरनसुख-दुखसमभावभक्ति

Marking scheme

  1. 1.1 अंक: सांसारिक मनुष्यों का दृष्टिकोण — केवल दुख में सुमिरन, सुख में भुला देना।
  2. 2.1 अंक: कबीर का दृष्टिकोण — सुख में भी सुमिरन करने से दुख न आने की शिक्षा, समभाव की बात।

Hint

याद रखें दोहा: 'दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय' — इसी पर आधारित उत्तर दें।

Quick oral answer

सांसारिक मनुष्य दुख में ही ईश्वर को याद करते हैं, पर कबीर कहते हैं कि सुख में भी सुमिरन करने से दुख आता ही नहीं।

Common mistakes

  1. 1.केवल आधा उत्तर देना — सांसारिक मनुष्यों की बात लिखकर कबीर की सीख न लिखना।
  2. 2.दोहे को शब्दशः न समझकर सामान्यीकृत उत्तर देना जिसमें साखी का सटीक भाव न आए।

Analysis and explanation

कबीर का यह दोहा भक्ति-काल की निर्गुण परंपरा में स्वार्थरहित, निरंतर ईश्वर-स्मरण की भावना को व्यक्त करता है।


मूल भाव

  • दोहा: 'दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे होय।'
  • सांसारिक मनुष्य ईश्वर को केवल 'संकटमोचन' मानते हैं — मुसीबत में पुकारते हैं, सुख में भूल जाते हैं।
  • कबीर इस दोहरे व्यवहार पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि सुख में भी कृतज्ञता व स्मरण बना रहे तो दुख उत्पन्न ही न हो।

परीक्षा में सावधानी

  • विद्यार्थी प्रायः केवल 'सुख में सब भूल जाते हैं' तक सीमित रह जाते हैं।
  • पूर्णांक के लिए दोनों पक्ष लिखना आवश्यक है — सांसारिक मनुष्य का व्यवहार तथा कबीर का उपदेश (सुख में भी सुमिरन)।

वास्तविक जीवन में

  • आधुनिक जीवन में भी लोग सुख-समृद्धि के समय आध्यात्मिकता और कृतज्ञता भूल जाते हैं, संकट में ही ईश्वर या नैतिक मूल्यों की ओर लौटते हैं।

Interesting facts

कबीर की साखियाँ दोहा छंद में रचित हैं और इन्हें कबीरपंथ में आज भी गाया-सुनाया जाता है।

'साखी' शब्द संस्कृत के 'साक्षी' से बना है, अर्थात प्रत्यक्ष अनुभव से कही गई सीख।

कबीर स्वयं निरक्षर माने जाते हैं, फिर भी उनकी वाणी को उनके शिष्यों ने संकलित कर 'बीजक' में सुरक्षित रखा।

Question details

Q49 of 66 questions

Board
CBSE
Class
Class 10
Subject
Hindi Course B
Year
2026
Section
Section ग
Marks
2
Type
Short Answer
Chapter
अपठित गद्यांश (गद्य बोध)
Topic
साखी — सुख-दुख पर कबीर की दृष्टि
Bloom's level
understand
Syllabus topic
स्पर्श भाग-2, पद्य खंड: साखी (कबीर) — सुख-दुख और सुमिरन का भाव
Author
CBSE
Reviewed by
Padhantu Academic Team

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Frequently asked questions

साखी में कबीर किस भाषा का प्रयोग करते हैं?

कबीर 'सधुक्कड़ी' भाषा का प्रयोग करते हैं, जो अवधी, ब्रज, खड़ी बोली, पंजाबी आदि कई भाषाओं के मिश्रण से बनी है, जिसे 'पंचमेल खिचड़ी' भी कहा जाता है।

क्या यह दोहा निर्गुण भक्ति परंपरा का है?

हाँ, कबीर निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख कवि हैं और इस दोहे में निराकार ईश्वर के प्रति निरंतर स्मरण की बात कही गई है।